
आज दिनाँक 7 फरवरी, 2026 को एनएचपीसी, बनबसा गेस्ट हाऊस, चम्पावत के सभागार में राज्य सरकार द्वारा राज्य के आगामी बजट पर चर्चा हेतु पूर्व बजट संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर श्री पुष्कर सिंह धामी, माननीय मुख्यमन्त्री, उत्तराखण्ड मुख्य अतिथि थे तथा श्री आर के सुधांशु, अपर मुख्य सचिव, श्री दिलीप जावलकर, प्रमुख सचिव वित्त, श्री बीवीआरसी पुरुषोत्तम, सचिव, सहकारिता, श्री धीरज गर्ब्याल, सचिव पर्यटन, श्री दीपक रावत, आयुक्त कुमाऊँ मण्डल तथा श्री दीपक बाली, मेयर, काशीपुर भी उपस्थित थे।
कार्यक्रम में केजीसीसीआई अध्यक्ष, श्री पवन अग्रवाल द्वारा माननीय मुख्यमन्त्री जी से मांग की गई कि उद्योगों की आवश्यकतानुसार बड़ी संख्या में भारी वाहनों के यातायात के दबाव को सहन करने में सक्षम उच्च गुणवत्ता मानकों एवं चैड़ीकरण के साथ सड़कों के निर्माण, उद्योगों में निर्बाध विद्युत आपूर्ति हेतु राज्य के संपूर्ण पावर इंफ्रास्ट्रक्चर का किसी सक्षम एजेंसी से तकनीकी ऑडिट कराया जाए तथा ऑडिट के आधार पर पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ एवं आधुनिक बनाने की कार्ययोजना तैयार की जाए।
रोड इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकासः आगामी बजट में राज्य की सड़कों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए। सड़कों का निर्माण केवल मरम्मत तक सीमित न होकर चैड़ीकरण एवं उच्च गुणवत्ता मानकों के अनुरूप किया जाए, ताकि आने वाले वर्षों में बढ़ने वाले यातायात को सुचारु रूप से संभाला जा सके। प्रदेश में कुछ सड़क मार्ग अत्यंत जर्जर अवस्था में हैं, विशेष रूप से काशीपुर-ठाकुरद्वारा-मुरादाबाद, काशीपुर-बाजपुर-मुरादाबाद एवं काशीपुर-रामनगर मार्ग, जिन पर पर्यटकों एवं स्थानीय लोगों का आवागमन अधिक रहता है। अतः इन सड़कों के शीघ्र निर्माण हेतु बजट में समुचित प्रावधान किया जाना आवश्यक है।
लॉजिस्टिक/ट्रांसपोर्ट पॉलिसी का निर्धारणः वर्तमान में पश्चिमी राज्यों में माल भेजने पर 10-15% तथा दक्षिणी राज्यों में 12-18% तक लॉजिस्टिक लागत आती है। इसे कम करने के लिए राज्य में प्रभावी लॉजिस्टिक नीति बनाई जाए, जिससे यह लागत लगभग 5% कम हो जाये। अतः इस बजट में लॉजिस्टिक, ट्रांसपोर्ट एवं वेयरहाऊसिंग नीति के लिए प्रावधान किया जाना चाहिए।

अतिरिक्त ऊर्जा क्रय की आवश्यकता एवं पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकासः राज्य में विद्युत पारेषण एवं वितरण अवसंरचना पुरानी होने के कारण उद्योगों को बार-बार बिजली कटौती, वोल्टेज फ्लक्चुएशन और फॉल्ट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मामूली खराबी पर भी फीडर एवं सब-स्टेशन में फॉल्ट आ जाने से उत्पादन प्रभावित होता है। उद्योगों में स्थापित अत्याधुनिक मशीनें वोल्टेज व पावर ट्रिपिंग के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। अतः इन समस्याओं के समाधान हेतु बजट के माध्यम से अतिरिक्त ऊर्जा क्रय एवं पावर इन्फ्रास्ट्रक्चर के सुदृढ़ीकरण की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य के संपूर्ण पावर इंफ्रास्ट्रक्चर का किसी सक्षम एजेंसी से तकनीकी ऑडिट कराया जाए तथा ऑडिट के आधार पर पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुदृढ़ एवं आधुनिक बनाने की कार्ययोजना तैयार की जाए। वर्तमान स्थिति को देखते हुए राज्य में बढ़ती विद्युत मांग को पूरा करने हेतु पर्याप्त व्यवस्था आवश्यक है, ताकि उद्योगों को बाहर से महंगी बिजली न खरीदनी पड़े। अतः यूपीसीएल को बाजार से बिजली क्रय की पूर्व-निश्चित व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए।
उत्तराखंड पर्यटन उद्यमी प्रोत्साहन योजना, 2024: इस योजना के तहत पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के लिए नीति में सुधार की जरूरत है। वर्तमान में कैपिटल इन्वेस्टमेंट सब्सिडी करे 10 वर्षों में विभाजित कर दिया गया है। सुझाव है कि इसे 10 वर्ष के लिए न करके इसको पहले 3 वर्षों में ही उद्योगों को दे दिया जाए।
उद्योगों के लिए ट्रांसपोर्ट सब्सिडी का प्रावधानः राज्य में उद्योगों के लिए बंद की गई ट्रांसपोर्ट सब्सिडी को पुनः शुरू करने की आवश्यकता है। पहले इसके दुरुपयोग की शिकायतों के कारण इसे बंद कर दिया गया था, लेकिन अब आधुनिक तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम की मदद से इसे सुरक्षित रूप से लागू किया जा सकता है। सरकार को सुझाव है कि दूरी के आधार पर उद्योगों को लगभग 25% ट्रांसपोर्ट सब्सिडी प्रदान की जाए।
टैक्स और सेस का न्यायसंगत निर्धारणः जीएसटी लागू होते समय कहा गया था कि जीएसटी एक मात्र टैक्स है और बाकी इसके अलावा कोई टैक्स नहीं लगेंगे। लेकिन वर्तमान में उद्योगों पर कई अतिरिक्त सैस लगाए जा रहे हैं। विशेषकर सेन्ट्रल गवर्नमेंट के ग्राउंड वॉटर सैस के बाराबर ही अभी एक वाटर सैस और लगा दिया गया है जबकि उत्तर प्रदेश में यह सैस बहुत कम है। मांग है कि राज्य में भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर कम और न्यायसंगत सेस लागू किया जाए।
मण्डी शुल्क एवं विकास उपकर में सुधारः उत्तराखंड के कृषि उद्योगों को कच्चा माल बाहरी राज्यों से मंगाना पड़ता है, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है। उत्तर प्रदेश में मण्डी शुल्क और विकास उपकर की दर 1.5% है, जबकि उत्तराखंड में यह 2.5% है। सुझाव है कि जो उद्योग दूसरे राज्यों में शुल्क देकर कच्चा माल लाते हैं, उन पर राज्य में पुनः मण्डी शुल्क न लगाया जाए।
उद्योगों पर बिल्डिंग एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम, 1996 (BOCW) के तहत लगाए गए श्रमिक उपकर की मांगः राज्य के औद्योगिक प्रतिष्ठानों को BOCW अधिनियम, 1996 के तहत भारी मांग के नोटिस दिए जा रहे हैं। तर्क यह है कि जो इकाइयाँ फैक्ट्री अधिनियम, 1948 के तहत पंजीकृत होकर उत्पादन शुरू कर देती हैं, वे स्वतः ही BOCW अधिनियम की ‘निर्माण कार्य‘ परिभाषा से बाहर हो जाती हैं, अतः उन पर यह उपकर नहीं लगना चाहिए।
उक्त कार्यक्रम में केजीसीसीआई अध्यक्ष, श्री पवन अग्रवाल के साथ महासचिव, श्री नितिन अग्रवाल भी उपस्थित थे।



